Wednesday, 15 August 2012

स्वतंत्रता दिवस


आज स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों,अधिकारीगण ,कर्मचारी गण और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कुलपति प्रोफेसर सुन्दर लाल जी नें कहा कि ------
  स्वतंत्र  भारत आज ६५ वर्ष का हो गया.इस ६५ वर्ष के इतिहास में जहाँ अनेकों स्वर्णिम पृष्ठ  भरे पड़े हैं वहीं काले पन्नों की भी कमी नहीं है.आज स्वत्रंत्रता की  वर्षगांठ पर सुनहरे पल की बात करता हूँ .स्वर्णिम पृष्ठों की श्रृंखला में अभी एक और अध्याय जुड़ा है और हमें गर्व है ,हम अपनें  को सौभाग्यशाली समझते   है कि  उस पृष्ठ के लिखे जाने के हम भी साक्षी हैं.यह स्वर्णिम पृष्ठ और कोई नहीं लन्दन ओलम्पिक में हमारे होनहारों द्वारा ६ पदकों की प्राप्ति है .जिन देशवासियों की ऑंखें ओलम्पिक पदक तालिकाओं में भारत के एक अथवा शून्य देखने की आदी हो चुकी हों ,वहां ६ की संख्या सचमुच चकित करती है.ये ६ पदक हमारे देश के सभी भौगोलिक हिस्सों (मणिपुर से लेकर हरियाणा ,हिमांचल से लेकर कर्नाटक तक )सहित ग्रामीण भारत ,शहरी क्षेत्रों का भी   प्रतिनिधित्व करते हैं.खेलों के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारतीय नारी का का भी जयघोष  हुआ है.मैं  इस पृष्ठ को अपने इतिहास का बंगलादेश विजय से भी अधिक चमकीला मानता हूँ.

ओलम्पिक चार वर्ष के अंतराल पर पर होते है तथा इसमें कुछ चयनित प्रतिभागी ही शिरकत करते है.एक और ओलम्पिक है जो सतत रूप में चलता है.स्वत्रन्त्र भारत के जन्म से ही चलता आ रहा है ,इसके प्रतिभागी कुछ चयनित व्यक्ति नहीं वरन इस देश का प्रत्येक 

नागरिक है.इस ओलम्पिक में सफलता के मानक गतिमान हैं,उपलब्धि के साथ-साथ ऊँचे होते चलते है .मेरा आशय स्वत्रन्त्र भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध से है.भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध का ये ओलम्पिक (स्वतंत्र)देश के जन्म से ही चल रहा है और देश का प्रत्येक (प्रबुद्ध)नागरिक इस ओलम्पिक में प्रतिभागी बन कुछ सफलता प्राप्त करना चाहता है.रास्ते  भी सबके एक जैसे नहीं है.कोई खून खराबा करता है तो कोई मार पीट.कोई धरना प्रदर्शन करता है तो कोई अनशन.कोई-कोई सिरफिरा तो आमरण अनशन तक कर बैठता है.पिछले ६५ वर्षों से चल रहे इस ओलम्पिक को  कुछ छोटी -मोटी सफलता मिली हो तो मिली हो,किसी पदक प्राप्त करने लायक सफलता किसी को नही मिली है ,कम से कम इतिहास तो ऐसा ही कहता है.एक बाधा-दौड़  चलती सी लगती है जिसमें अवरोधों की सीमा  भी निर्धारित नहीं है.सफ़ेद धोती-कुरता पहने ,टोपी लगाये एक गंवार अनशन पर बैठ गया और गवारु   भाषा में बोला लोकपाल लाओ लाओ नहीं तो जाओ .वातावरण में गूंजती कानफोडू आवाज़ कहती है  न लोकपाल लायेंगे -न लाने देंगे,पर तुम्हे जरूर ठिकाने लगा देंगे.
ओलम्पिक के प्रतिभागी जानते है की सफलता कठिनता से मिलती है .तात्कालिक असफलताओं से निराश न होने वालों को मदद अपनें साहस  और तकनीकी में सुधार से मिलती है .इसका  उदाहरण हमें एक अन्य ओलम्पिक में देखने को मिला जो पिछली सदी  के प्रारंभ में खेला गया था और जिसकी परिणति हम आज ६६वे स्वतंत्रता दिवस के रूप में देख रहे हैं.आजादी के आन्दोलन में कितने उतर-चढाव आये ,अनेको बार  -लगा कि  आन्दोलन दम तोड़ देगा पर एक शख्स था जो इस मैराथन में भी लगातार दौड़ता रहा ,तात्कालिक लाभों की चिंता कए बगैर .उसे विश्वास था लक्ष्य तक पहुचने का .दूर से ही धीमी ही सही आजादी की दस्तक वह सुन रहा था.प्रश्न यह उठता है ,क्या था कारण उसके विश्वास का ,क्या थी वो शक्ति  जो उस क्षीण काय को और उत्तेजित और स्फूर्तिक बना रही थी  ?
महात्मा गांधी जी के चरित्र की शुद्धता बेजोड़ थी .संभवतः पूरे विश्व के इतिहास में गांधी जी जैसे शुद्ध चरित्र का मिलना दुष्कर है .इस हेतु उन्होंने कभी समझौता नहीं किया ,नितांत अकेला पड़ जाने के डर  से भी .यही उनकी पूंजी थी .चारित्रिक शुद्धता ही उनके लिए ईश उपासना का चरम था यही उनकी शक्ति और विश्वास था.इसी गुण के कारण भारतीय समाज के हर पक्ष पर उनका प्रभाव पड़ा .आज १५ अगस्त का दिन उनकी उपलब्धियों का स्थूलतम साक्ष्य है.

ऐसा लगता है गांधी की विदाई के साथ ही उनकी शक्ति का यह स्रोत हमारे समाज से काफूर हो गया .हजारों -करोड़ों के घोटाले आम होने लगे और भ्रष्टाचार की बात कुछ सिरफिरे लोंगों का शगल माना  जाने लगा.संसद मुंह चुराने लगी और नेतागण शब्दों की जुगाली करने लगे .हमारे छात्र क्या इस स्थिति के प्रति जागरूक हैं?चरित्र की शुद्धि के प्रयास क्या उनके किसी एजेंडे में शामिल है?यदि हाँ तो हम उस दिन की प्रतीक्षा में जी सकते है जिस दिन देश उसी खुशी से झूमेगा जैसे आज हमारे ६ जाबांज  पदक विजेताओं की उपलब्धियों से है.इसी अवस्था  में हम अपनी स्वतंत्रता  के इतिहास में नये-नये स्वर्णिम पन्ने जोड़ पाएंगे. 

Monday, 30 July 2012

आज की युवा पीढी को बापू के आदर्शों की जरूरत :प्रो सुंदर लाल

    राम करन महाविद्यालय इशोपुर गाजीपुर में आयोजित हुआ बापू बाजार  


आज की युवा पीढी को बापू के आदर्शों की जरूरत हैं.इस बापू बाजार में बापू का सन्देश छुपा हुआ हैं.आज हमने बापू के विचारों को अपने से दूर कर लिया हैं जिसके कारण समाज में तमाम तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं.कब, कहा, कौन सी हिंसक घटना हो जाये कोई नही जानता.आज यह बाजार गरीबों की सेवा के साथ साथ बापू की सोच से परिचित करता हैं.


यह बातें वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुंदर लाल ने २९ जुलाई  को राम करन महाविद्यालय इशोपुर गाजीपुर में आयोजित ११ वें बापू बाजार में कहीं.उन्होंने कहा कि आज हम पर्यावरण से बहुत खिलवाड़ कर रहे हैं जो कि आने वाले समय के लिए ठीक नहीं हैं. गाँधी ने एक छोटा सा प्रयोग किया था कि किसी वास्तु का तब तक प्रयोग करे जब तक करना चाहिए.बापू बाजार में यह सोच निहित हैं. उन्होंने कहा कि बापू बाजार के माध्यम से बच्चों में को कोमल भावनाएं जागृत हुई हैं वो आगे चल कर और भी बलवती होगी ऐसी मेरी कामना हैं.

राष्ट्रीय सेवा योजना के सहायक कार्यक्रम सलाहकार भारत सरकार डॉ एच के शर्मा ने कहा कि यह बाजार लाभ - हानि के सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं .इस नेक पहल में एन एस एस का सहयोग विश्वविद्यालय ने लिया हैं यह सुखद हैं. राज्य संपर्क अधिकारी डॉ सतेन्द्र बहादुर सिंह ने कहा कि बापू बाजार से  राष्ट्रीय सेवा योजना को एक नई पहचान मिली हैं.प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालाओं के लिए पूर्वांचल विश्वविद्यालय प्रेरणा का श्रोत बन गया हैं. 


शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ देवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि इस   बापू बाजार के माध्यम से लोगों का गरीबों के प्रति सम्मान का भाव पैदा हुआ हैं जो पाठ्यक्रम के माध्यम से नही हो सकता.छात्रों के मन में पैदा हुए ये भाव एक नई दिशा देंगे.
राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्यवयक डॉ हितेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रीय सेवा योजना के क्रिया कलापों के साथ साथ बापू बाजार के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला.महाविद्यालय के प्रबंधक विधान परिषद सदस्य विजय यादव के कहा कि आज इस बापू बाजार को लगा कर मेरा महाविद्यालय धन्य हो गया.यहाँ से जो बापू का सन्देश प्रवाहित  हुआ हैं उसके दूरगामी परिणाम होंगे .
बापू बाजार में ३ दर्जन से अधिक महाविद्यलों के स्वयं सेवक- सेविकाओं ने भाग २-१० रुपए के प्रतीकात्मक मूल्य पर कपडें अन्य वस्तुओं को बेचा.बच्चे मुफ्त में खिलौना एवं किताबें पा कर काफी खुश दिखे .डॉ ममता तिवारी के लक्ष्य गायन के साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ .कार्यक्रम का संचालन डॉ एम हसीन खान ने किया.इस अवसर पर डॉ के डी सिंह,डॉ शशि कुमार मिश्र,डॉ पूनम मिश्र ,डॉ वेद  प्रकाश चौबे ,डॉ ब्रजेश यदुवंशी,हरिनारायण यादव, डॉ प्रताप रावत,डॉ दिग्विजय सिंह राठौर  समेत अन्य लोग मौजूद रहे.

राष्ट्रीय सेवा योजना की स्मारिका का हुआ विमोचन 

राम करन महाविद्यालय इशोपुर गाजीपुर में आयोजित ११ वें बापू बाजार में राष्ट्रीय सेवा योजना की स्मारिका का विमोचन हुआ.स्मारिका में विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में राष्ट्रीय सेवा योजना की प्रमुख गतिविधियों को दर्शाया गया हैं.इसके साथ ही कुलपति  प्रो सुंदर लाल , डॉ के एस तोमर, डॉ एम हसीन, डॉ धरम सिंह,डॉ अवधेश मिश्र  आदि के लेख भी हैं. पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ हितेंद्र प्रताप सिंह ,सहायक संपादक डॉ दिग्विजय सिंह राठौर संपादक मंडल में डॉ अवध बिहारी सिंह ,डॉ ब्रजेश यदुवंशी एवं डॉ अंसार खान हैं .




Friday, 20 July 2012

शिक्षकों को समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए ...


 शिक्षक समाज का आदर्श होता है।शिक्षकों को समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए। उसके आचरण, व्यवहार, मूल्य की छात्र ही नहीं बल्कि समाज का हर व्यक्ति नकल करता है।  विवि के सत्रारंभ  होने पर संकाय भवन में आयोजित पहली बैठक में परिसर शिक्षकों को संबोधित करते हुए    कुलपति प्रो.सुंदरलाल ने कहा कि  शिक्षकों से समाज को काफी उम्मीदें रहती है। लिहाजा सभी विभागों के शिक्षक सामूहिक प्रयास कर ऐसा उत्कृष्ट शैक्षणिक वातावरण सृजित करें कि इससे प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से छात्र यहां उच्च शिक्षा ग्रहण करने आएं। कुलपति जी  ने आश्वासन दिया कि परिसर में प्रयोगशाला, शोध या शिक्षण संबंधित जो भी बुनियादी सुविधाएं हैं, उनके समाधान के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। उन्होंने निर्देश दिया कि शिक्षक स्वयं अनुशासित होकर छात्रों की उपस्थिति पंजिका पर प्रतिदिन के व्याख्यान का ब्यौरा सुनिश्चित कराएं। 
उन्होंने कहा कि अनुशासन किसी किताब से नहीं पढ़ा जाता, इसे तो एक शिक्षक को खुद के अंदर विकसित करना होगा।छात्र भी अपनेशिक्षक से काफी उम्मीद करता है। शिक्षक का नैतिक कर्तव्य हैकि वह छात्र का सही दिशा निर्देशन करके उसे योग्य बनाए। छात्र कीयोग्यता से ही शिक्षक की पहचान होती है। उन्होंने कहा कि हमसभी की शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिएसभी शिक्षकों को अपने सुझाव रखने का हक है। उस पर अमलकिया जाएगा। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में अनुदान के लिएप्रस्ताव भेज दिया गया है। परिसर में आदर्श शैक्षिक वातावरण की नींव पड़े यही हमारी प्राथमिकता होगी। अनुशासन को पढ़ने की नहीं बल्कि सीखने की जरूरत होती है। इसे शिक्षक के साथ हर छात्र को अपने भीतर विकसित करना होगा।