Monday, 3 September 2012

श्रेष्ठ कवियों में एक थे श्रीपाल सिंह क्षेम


                                      श्रीपाल क्षेम श्रद्धांजलि 
व्यक्त करूँ  मन की पीड़ा,
या कहूँ  कही तन की अनुभूति।
वैचारिक कोई द्वन्द निहारू,
गाऊॅं या जन मन की प्रीति।।
उद्गारों की नैया खेने,
पतवारी शब्द नहीं पाता हूँ ।
भाव भंवर में घूम झूम,
हिचकोले खाता जाता हूँ।।
अक्षर मात्राएँ  खोज बीन,
तब जोड़े गुणा बैठाता  हूँ।
शब्दों छन्दो की माला मैं,
‘श्रीपाल क्षेम’ में पाता हूँ।।
पसरी पीड़ा किसी कुटी की,
किसी महल की आभा आहट।
व्यक्त हुई सब ‘क्षेम कलम’ से,
भावों-शब्दों की तकराहट।।
बॅंजारे मन की खूँटी  पर,
टांगी तुमने तरी तरी।
कभी ‘नीलम तरी’, कभी ‘ज्योति तरी’,
कभी ‘जीवन’ कभी ‘संघर्ष तरी’।।
कहीं ‘तेरे रूप’ की गंगा है,
कहीं जमुना ‘मेरी प्रीत’ की है।
कहीं ‘रूप गंध’ कहीं ‘गीत गंग’,
छायावादी संगीत सी है।।
कहीं ‘राख और पाटल’ परसे हैं,
कहीं ‘मुक्त कुन्तला’ चमकी है।
कहीं ‘मुक्त गीतिका’ ‘गीत जनों में,
‘अंतर ज्वाला’ धधकी है।।
कभी शब्द दिये ‘परासर’ को,
और ‘सत्यवती’ जीवंत हुई।
‘कृष्ण-द्वैपायन’ है अतीत,
पर वर्तमान से मुक्त नहीं।।
इसीलिए मैं बार-बार,
कहता हूँ नहीं अघाता हूँ।
हर बार उन्हें बुलाता हूँ,
‘हे क्षेम शब्द दो’ गाताहूँ।।
                 - प्रो. सुंदर लाल 

 

जौनपुर 2 सितम्बर : साहित्य वाचस्पति डॉ.श्रीपाल सिंह 'क्षेम' देश के एक श्रेष्ठ कवि थे। जीवन के विविध रूपों का चित्रण क्षेम जी की कविताओं में मिलता है।

उक्त उदगार  वीर बहादुर सिंह पूर्वाचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सुंदर लाल ने क्षेम जी के 91 वें जन्म दिवस पर क्षेमस्विनी संस्था द्वारा पत्रकार भवन में रविवार को आयोजित जनपद साहित्य दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किया। कुलपति ने बताया कि पूर्वाचल विश्वविद्यालय एवं तिलकधारी महाविद्यालय का कुलगीत क्षेम जी द्वारा रचित है। अपनी स्वरचित कविता 'गीतों की नैया खेने को पतवार नहीं मैं पाता हूं, भाव-लहर में झूल-झूलकर हिचकोले खाता जाता हूं।..........' के माध्यम से उन्होंने स्व.क्षेम को भावांजलि अर्पित की। प्रख्यात समीक्षक डॉ.लाल साहब सिंह ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा कि क्षेम जी श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ महान समीक्षक भी रहे। छायावाद की काव्य-साधना, छायावाद के गौरव चिह्न तथा छायावाद की सामाजिक पृष्ठभूमि जैसे समीक्षा-ग्रंथों की रचना करके उन्होंने हिंदी साहित्य का भंडार समृद्ध किया। डॉ.प्रेमचंद विश्वकर्मा ने बताया कि वे हिंदी के साथ-साथ संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं पर भी असाधारण अधिकार रखते थे। तिलकधारी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.यूपी सिंह ने बताया कि कवि सम्मेलनों में क्षेम की कविताएं सुनने के लिए श्रोताओं की बार-बार फरमाइशें आती रहती थी। नगरपालिका परिषद के चेयरमैन दिनेश टंडन ने उनकी स्मृतियों को संजोए रखने के लिए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया। क्षेमस्विनी संस्था के अध्यक्ष एवं समाजवादी विचारक वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि क्षेम जी की रचनाओं में प्रेम के जिस स्वरूप का चित्रण मिलता है, वह सांसारिक न होकर पूर्णत: आध्यात्मिक है। अध्यक्षता कर रहे पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद ने उन्हें विलक्षण प्रतिभा का धनी बताया।
इस अवसर पर शिक्षक नेता राजीव प्रकाश सिंह, डॉ.शिव प्रसाद सिंह एवं संतोष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट ने विभिन्न संस्मरणों के माध्यम से कवि क्षेम के व्यक्तित्व को रेखांकित किया। समारोह में क्षेम जी द्वारा रचित पुस्तक 'नीलम ज्योति और संघर्ष' का विमोचन मुख्य अतिथि द्वारा किया गया। कार्यक्रम में रामकृष्ण त्रिपाठी, स्वप्निल, डॉ.पीपी दुबे, डॉ.विमला सिंह, डॉ.मनोज मिश्र, बाबा धर्म पुत्र अशोक, त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, दुष्यंत सिंह, वीरेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट, अजय कुमार आदि उपस्थित रहे। संचालन प्रखर आभार ज्ञापन शशिमोहन सिंह क्षेम ने किया।
साभार- www.jagran.com/uttar-pradesh/jaunpur-9626511.html

Sunday, 2 September 2012

ऋतुअभिनंदन मे पौधरोपण


गीतांजलि संस्था द्वारा रविवार को सिपाह स्थित अचला देवी घाट पर आयोजित ऋतु अभिनंदन समारोह में पौधे लगाए गए। इस  ऋतुअभिनंदन समारोह में  मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. सुंदर लाल विशिष्ट अतिथि डीएफओ एके सिंह, नगर पालिका अध्यक्ष दिनेश टंडन सहित गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। इन्होने  वाटिका में चन्दन ,पीपल, बेल,आंवला ,अशोक, बरगद  आदि के पौधे  लगाए।       
 

  
                    ऋतु अभिनंदन समारोह में चंदन  का पौध रोपित करते
कुलपति प्रो. सुंदर लाल
 
संस्था के प्रमुख ने कुलपति को स्मृति चिन्ह भेट किया          

मंचासीन बाएं से दायें कुलपति प्रो सुंदर लाल , डी एफ ओ जौनपुर ,
न पा  अध्यक्ष  दिनेश  टंडन  एवं  संस्था  के अध्यक्ष  

कार्यक्रम को संबोधित करते कुलपति 
       पंचवटी में शामिल पाँच वृक्षों-पीपल, बरगद, आँवला, बेल तथा अशोक का रोपण हुआ 
पौधा रोपण कार्यक्रम मे जुटे संभ्रांत नागरिक

Sunday, 26 August 2012

26 अगस्त को मऊ के ऋषि रामनरेश कृषक महाविद्याल मे लगा बापू बाज़ार

               
             बारहवें बापू बाज़ार का उद्घाटन करते हुए  एक वृद्ध ग्रामीण  साथ मे  दाहिने प्रो डी डी  दूबे और बाएं डॉ हीतेंद्र  प्रताप सिंह 
 







Wednesday, 15 August 2012

स्वतंत्रता दिवस


आज स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों,अधिकारीगण ,कर्मचारी गण और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कुलपति प्रोफेसर सुन्दर लाल जी नें कहा कि ------
  स्वतंत्र  भारत आज ६५ वर्ष का हो गया.इस ६५ वर्ष के इतिहास में जहाँ अनेकों स्वर्णिम पृष्ठ  भरे पड़े हैं वहीं काले पन्नों की भी कमी नहीं है.आज स्वत्रंत्रता की  वर्षगांठ पर सुनहरे पल की बात करता हूँ .स्वर्णिम पृष्ठों की श्रृंखला में अभी एक और अध्याय जुड़ा है और हमें गर्व है ,हम अपनें  को सौभाग्यशाली समझते   है कि  उस पृष्ठ के लिखे जाने के हम भी साक्षी हैं.यह स्वर्णिम पृष्ठ और कोई नहीं लन्दन ओलम्पिक में हमारे होनहारों द्वारा ६ पदकों की प्राप्ति है .जिन देशवासियों की ऑंखें ओलम्पिक पदक तालिकाओं में भारत के एक अथवा शून्य देखने की आदी हो चुकी हों ,वहां ६ की संख्या सचमुच चकित करती है.ये ६ पदक हमारे देश के सभी भौगोलिक हिस्सों (मणिपुर से लेकर हरियाणा ,हिमांचल से लेकर कर्नाटक तक )सहित ग्रामीण भारत ,शहरी क्षेत्रों का भी   प्रतिनिधित्व करते हैं.खेलों के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारतीय नारी का का भी जयघोष  हुआ है.मैं  इस पृष्ठ को अपने इतिहास का बंगलादेश विजय से भी अधिक चमकीला मानता हूँ.

ओलम्पिक चार वर्ष के अंतराल पर पर होते है तथा इसमें कुछ चयनित प्रतिभागी ही शिरकत करते है.एक और ओलम्पिक है जो सतत रूप में चलता है.स्वत्रन्त्र भारत के जन्म से ही चलता आ रहा है ,इसके प्रतिभागी कुछ चयनित व्यक्ति नहीं वरन इस देश का प्रत्येक 

नागरिक है.इस ओलम्पिक में सफलता के मानक गतिमान हैं,उपलब्धि के साथ-साथ ऊँचे होते चलते है .मेरा आशय स्वत्रन्त्र भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध से है.भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध का ये ओलम्पिक (स्वतंत्र)देश के जन्म से ही चल रहा है और देश का प्रत्येक (प्रबुद्ध)नागरिक इस ओलम्पिक में प्रतिभागी बन कुछ सफलता प्राप्त करना चाहता है.रास्ते  भी सबके एक जैसे नहीं है.कोई खून खराबा करता है तो कोई मार पीट.कोई धरना प्रदर्शन करता है तो कोई अनशन.कोई-कोई सिरफिरा तो आमरण अनशन तक कर बैठता है.पिछले ६५ वर्षों से चल रहे इस ओलम्पिक को  कुछ छोटी -मोटी सफलता मिली हो तो मिली हो,किसी पदक प्राप्त करने लायक सफलता किसी को नही मिली है ,कम से कम इतिहास तो ऐसा ही कहता है.एक बाधा-दौड़  चलती सी लगती है जिसमें अवरोधों की सीमा  भी निर्धारित नहीं है.सफ़ेद धोती-कुरता पहने ,टोपी लगाये एक गंवार अनशन पर बैठ गया और गवारु   भाषा में बोला लोकपाल लाओ लाओ नहीं तो जाओ .वातावरण में गूंजती कानफोडू आवाज़ कहती है  न लोकपाल लायेंगे -न लाने देंगे,पर तुम्हे जरूर ठिकाने लगा देंगे.
ओलम्पिक के प्रतिभागी जानते है की सफलता कठिनता से मिलती है .तात्कालिक असफलताओं से निराश न होने वालों को मदद अपनें साहस  और तकनीकी में सुधार से मिलती है .इसका  उदाहरण हमें एक अन्य ओलम्पिक में देखने को मिला जो पिछली सदी  के प्रारंभ में खेला गया था और जिसकी परिणति हम आज ६६वे स्वतंत्रता दिवस के रूप में देख रहे हैं.आजादी के आन्दोलन में कितने उतर-चढाव आये ,अनेको बार  -लगा कि  आन्दोलन दम तोड़ देगा पर एक शख्स था जो इस मैराथन में भी लगातार दौड़ता रहा ,तात्कालिक लाभों की चिंता कए बगैर .उसे विश्वास था लक्ष्य तक पहुचने का .दूर से ही धीमी ही सही आजादी की दस्तक वह सुन रहा था.प्रश्न यह उठता है ,क्या था कारण उसके विश्वास का ,क्या थी वो शक्ति  जो उस क्षीण काय को और उत्तेजित और स्फूर्तिक बना रही थी  ?
महात्मा गांधी जी के चरित्र की शुद्धता बेजोड़ थी .संभवतः पूरे विश्व के इतिहास में गांधी जी जैसे शुद्ध चरित्र का मिलना दुष्कर है .इस हेतु उन्होंने कभी समझौता नहीं किया ,नितांत अकेला पड़ जाने के डर  से भी .यही उनकी पूंजी थी .चारित्रिक शुद्धता ही उनके लिए ईश उपासना का चरम था यही उनकी शक्ति और विश्वास था.इसी गुण के कारण भारतीय समाज के हर पक्ष पर उनका प्रभाव पड़ा .आज १५ अगस्त का दिन उनकी उपलब्धियों का स्थूलतम साक्ष्य है.

ऐसा लगता है गांधी की विदाई के साथ ही उनकी शक्ति का यह स्रोत हमारे समाज से काफूर हो गया .हजारों -करोड़ों के घोटाले आम होने लगे और भ्रष्टाचार की बात कुछ सिरफिरे लोंगों का शगल माना  जाने लगा.संसद मुंह चुराने लगी और नेतागण शब्दों की जुगाली करने लगे .हमारे छात्र क्या इस स्थिति के प्रति जागरूक हैं?चरित्र की शुद्धि के प्रयास क्या उनके किसी एजेंडे में शामिल है?यदि हाँ तो हम उस दिन की प्रतीक्षा में जी सकते है जिस दिन देश उसी खुशी से झूमेगा जैसे आज हमारे ६ जाबांज  पदक विजेताओं की उपलब्धियों से है.इसी अवस्था  में हम अपनी स्वतंत्रता  के इतिहास में नये-नये स्वर्णिम पन्ने जोड़ पाएंगे.