Thursday, 11 April 2024

कार्यशाला में मिले ज्ञान का करें प्रयोग- प्रो वंदना सिंह

पीयू में रिमोट सेंसिंग विषयक कार्यशाला का समापन

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय स्थित रज्जू भैया संस्थान के अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेज विभाग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार द्वारा चल रही सात दिवसीय  कार्यशाला  का गुरुवार को समापन हुआ. कार्यशाला में देश के दस प्रदेशों के विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों के 25 चयनित विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने इस कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त किया.

कुलपति प्रो वंदना सिंह ने समापन सत्र के पूर्व कुलपति सभागार में प्रमाण पत्र प्रदान किया. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पूर्वांचल विश्वविद्यालय निरंतर शोध और शैक्षिक उन्नयन की दिशा में कार्य कर रहा है. उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में आपको अपने विषय से सम्बंधित शोध एवं नवाचार की जो जानकारी प्राप्त हुई है उसे आप अपने अध्ययन में सम्मिलित कर जीवन में नई ऊंचाइयों तक पहुचेंगे. उन्होंने विभिन्न प्रदेशों से आए प्रतिभागियों से परिचय और कार्यशाला के बारे में फीडबैक लिया.

अंतिम दिन डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, अयोध्या के भू विज्ञान विभाग के डा. सौरभ सिंह ने जियोलॉजी के विभिन्न क्षेत्रों में रिमोट सेंसिंग तकनीकी के उपयोग पर व्याख्यान दिया तथा उसके अनुप्रयोगों पर चर्चा की । उन्होंने कहा कि रिमोट सेंसिंग तकनीकी का उपयोग व्यापक है एवं इसकी सहायता से विभिन्न वैज्ञानिकभौगोलिक तथा भूगर्भीय परिवर्तन का आकलन व सतत् क्रम आसानी से पता लगाया जा सकता है। उन्होंने रिमोट सेंसिंग मैपिंग से संबंधित विभिन्न एक्सरसाइज कराया एवं आर्क जीआईएस सॉफ्टवेयर के अनुप्रयोगों के संबंध में विभिन्न जानकारियां साझा की। कार्यशाला के संयोजक डा. श्याम कन्हैया ने कार्यशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत की. इस अवसर पर निदेशक प्रो. प्रमोद यादव, डॉ नीरज अवस्थीडा. शशिकांत यादव, डा. सौरभ सिंह, डा. श्रवण कुमार एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे. 

पीयू के डा. आलोक वर्मा, अनुराग पाण्डेय फेलोशिप के लिए चयनित


जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भईया) भौतिकीय विज्ञान अध्ययन एवं शोध संस्थान के भौतिक विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डा. आलोक कुमार वर्मा का चयन विज्ञान अकादमी ग्रीष्मकालीन अनुसंधान फेलोशिप– 2024 के लिए हुआ है। इसी फेलोशिप में परास्नातक भौतिक विज्ञान विभाग के छात्र अनुराग पाण्डेय भी चयनित हुए हैं। यह कार्यक्रम भारतीय विज्ञान अकादमी, बेंगलुरु, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, नई दिल्ली एवं भारतीय विज्ञान अकादमी, प्रयागराज द्वारा संयुक्त रुप से आयोजित किया जाता है। इस ग्रीष्मकालीन अनुसंधान कार्यक्रम के लिए डा वर्मा को राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, नई दिल्ली में दो माह का अध्येतावृत्ति अनुमोदित हआ है। यह प्रयोगशाला भारत में अन्तरराष्ट्रीय मात्रक प्रणाली का अनुरक्षण तथा राष्ट्रीय भार तथा माप के मानकों का अंशांकन (कैलीब्रेशन) करती है। डा. वर्मा इस दौरान राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, नई दिल्ली में डा. एन. विजनय के साथ थर्मोइलेक्ट्रिक मैटेरियल की डिज़ाइन पर कार्य करेंगे। इस मैटेरियल की मदद से अपशिष्ट उष्मीय ऊर्जा को उपयोगी विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है। दुनिया भर में प्राथमिक ऊर्जा खपत का लगभग 70% रूपांतरण प्रक्रिया के दौरान बर्बाद हो जाता है। डा वर्मा के निर्देशन में लघु शोध कार्य कर रहे परास्नातक भौतिक विज्ञान विभाग के छात्र अनुराग पाण्डेय का भी चयन इस फेलोशिप कार्यक्रम में हुआ है। अनुराग पाण्डेय एस. आर. एम. विश्वविद्यालय अमरावती, आंध्र प्रदेश के प्रो. रंजीत थापा के निर्देशन में दो माह तक डी. एफ. टी. आधारित कम्प्यूटेशनल पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. वंदना सिंह, रज्जू भईया संस्थान के निदेशक प्रो. प्रमोद कुमार यादव, प्रो. देवराज सिंह तथा संस्थान एवं परिसर के सभी शिक्षकों ने डा वर्मा तथा छात्र अनुराग पाण्डेय को बधाई दी।

Tuesday, 9 April 2024

गंगा के मैदानी इलाकों में जल संकट भारत के लिए खतरा- डॉ. सुशील कुमार

नदियों के अध्ययन में उपयोगी है रिमोट सेंसिंग तकनीक : डा. अतुल सिंह

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय स्थित रज्जू भैया संस्थान के अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेज विभाग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यशाला के पांचवें दिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ डा. सुशील कुमार ने जल संरक्षण एवं जल स्रोतों का पता लगाने हेतु रिमोट सेंसिंग तकनीक की उपयोगिता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिदृश्य में जल संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि अगर गंगा के मैदानी इलाकों में जल संकट बढ़ रहा है तो यह संपूर्ण भारतवर्ष के लिए बहुत बड़े खतरे का सूचक है। इसलिए नदियों, तालाबों व अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों  को बचाना नितांत आवश्यक है। विश्व की 17 प्रतिशत जनसंख्या भारत में रहती है जो विश्व के कुल भूभाग का 2.5 प्रतिशत है। बढ़ती आबादी के इस दौर में नये जल संसाधन तलाशने होंगे और नए स्रोतों के संदर्भ में शोध करने की जरूरत है, रिमोट सेंसिंग तकनीकी का उपयोग इस दिशा में सकारात्मक परिणाम ला सकता है।

पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय के डा. अतुल कुमार सिंह ने नदी विज्ञान के क्षेत्र में रिमोट सेंसिंग तकनीकी के उपयोग पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत की नदियों के बनने का क्रम कहीं न कहीं हिमालय की उत्पत्ति से संबंधित है तथा हिमालय पर्वतमाला में होने वाली प्रत्येक भूगर्भीय घटनाओं से नदियों की प्रकृति प्रभावित होती है। नदियों में विपथन की अपनी प्रकृति होती है जो स्वाभाविक है तथा हम इसे रोक नहीं सकते । इसलिए नदी परिक्षेत्र में होने वाले प्रत्येक निर्माण एवं अन्य विकास योजनाओं से पहले नदी का पूर्व में विपथन एवं पथ विस्थापन की सटीक जानकारी होना आवश्यक है। इसलिए नदियों के अध्ययन में रिमोट सेंसिंग की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। उन्होंने घाघरा नदी के पथ विस्थापन एवं उसके कारणों पर विस्तार से चर्चा की । उन्होंने कहा की नदी अपनी प्रकृति से अनुरूप व्यवहार करती रहती है जो बड़ी बाढ़ का कारण बनता है हम इसे रोक तो नहीं सकते परन्तु यदि नदियों की प्रकृति की वैज्ञानिक समझ के अनुसार विकास कार्य हो तो प्रत्येक वर्ष लाखों लोग विस्थापित होने से बच जाएंगे एवं बाढ़ आने पर त्रासदी का रूप नहीं लेगी।

तकनीकी सत्रों का संचालन कार्यशाला के संयोजक डा. श्याम कन्हैया ने किया। इस अवसर पर अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेज के विभागाध्यक्ष डॉ नीरज अवस्थी, डा. शशिकांत यादव, डा. सौरभ सिंह, डा. श्रवण कुमार एवं सभी प्रतिभागियों सहित विभाग के विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।

Monday, 8 April 2024

मानव सभ्यता पर जलवायु परिवर्तन का हुआ गहरा असर- प्रो. ध्रुवसेन


बाढ़ नियंत्रण के अध्ययन में रिमोट सेंसिंग तकनीक की महती भूमिका- डॉ. मेधा झा

- पूर्वांचल विश्वविद्यालय में चल रही कार्यशाला में भू वैज्ञानिकों का हुआ व्याख्यान

- प्रो. बीएन सिंह और प्रो. प्रफुल्ल ने प्रतिभागियों से की चर्चा

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय स्थित रज्जू भैया संस्थान के अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेज विभाग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यशाला  में सोमवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह ने जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक आपदाओं पर उसके प्रभाव पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर होने वाली प्रत्येक आपदाएं कहीं न कहीं जलवायु परिवर्तन पर आधारित है । उन्होंने कहा कि पृथ्वी के इतिहास में मानव सभ्यता के पहले भी जलवायु परिवर्तन होते रहे हैं परंतु आज की परिस्थितियों में मानवजनित गतिविधियों की वजह से उसकी दर प्रभावित हो रही है जो बड़ी चिंता का कारण है ।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की अपेक्षा पर्यावरण प्रदूषण में मानवजनित गतिविधियों का अधिक योगदान है। उन्होंने कहा कि प्रकृति अपना बैलेंस खुद बनाती है और अपनी जरूरतों का पूरा कर सकती है लेकिन वर्तमान समय में विकास की होड़ में प्रकृति पर बहुत बुरा असर हुआ है। प्रो. ध्रुवसेन ने से आर्कटिक पोल पर भारत के ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए स्थगित भारत के स्टेशन हिमाद्रि की स्थापना एवं अन्य वैज्ञानिक आयामों पर विस्तार से चर्चा की।

 द्वितीय सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी. पी. सिंह ने विंध्य पहाड़ियों में पूरा-भूकंपीय तरंगों के परिणामस्वरूप बनने वाली विभिन्न संरचनाओं के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सोनभद्र, मिर्जापुर चित्रकूट जिले की विंध्य पहाड़ियों में तमाम ऐसी संरचनाएं मिलती हैं जो ये सुनिश्चित करती हैं कि पूर्व में यह परिक्षेत्र भूकंप का बड़ा केंद्र  था।

इसी क्रम में केन्द्रीय दक्षिण बिहार विश्वविद्यालय गया से आये प्रोफेसर प्रफुल्ल कुमार सिंह ने भूस्खलन एवं उसके अध्ययन में रिमोट सेंसिंग के उपयोग पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पहाड़ी इलाकों में सड़कों के बनने से पहले रिमोट सेंसिंग तकनीकी के माध्यम से उनकी क्षमताओं एवं भविष्य में होने वाले नुकसान का पता आसानी से लगाया जा सकता है। उन्होंने उत्तराखंड राज्य के चकराता - कालसी रोड कॉरिडोर निर्माण एवं विभिन्न भूस्खलन के तथ्यों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसी भी प्राकृतिक आपदा में हुए नुकसान का तात्कालिक रूप से आकलन करना एवं राहत पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है । पहाड़ी इलाकों में प्रतिदिन कहीं न कहीं भूस्खलन होता रहता है जिससे मानीटर करने के लिए रिमोट सेंसिंग सबसे सुगम तकनीक है।

आई आई टी बीएचयू की विशेषज्ञ डा. मेधा झा ने रिमोट सेंसिंग तकनीक के माध्यम से नदियों पर होने वाले शोध पर अपने विचार व्यक्त किये । उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जल संरक्षण एवं बाढ़ नियंत्रण के अध्ययन में भी रिमोट सेंसिंग तकनीकी की महती भूमिका है। इस अवसर पर रज्जू भइया संस्थान के निदेशक प्रोफेसर प्रमोद यादव एवं प्रोफेसर देवराज सिंह ने बाह्य विशेषज्ञों का अंगवस्त्रम तथा स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। तकनीकी सत्रों का संचालन कार्यशाला के संयोजक डा. श्याम कन्हैया ने किया। इस अवसर पर अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेज के विभागाध्यक्ष डॉ नीरज अवस्थी, डा. शशिकांत यादव, डा. सौरभ सिंह, डा. श्रवण कुमार एवं सभी प्रतिभागियों सहित विभाग के विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।