Tuesday, 2 August 2011

बापू बाज़ार : पुष्पित और पल्लवित होता एक विचार

एक विचार को पल्लवित और पुष्पित होते देख कितनी खुशी होती है इसका अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है.अभी छ माह पूर्व तक बापू-बाज़ार क्या है,क्यों है ?इसके बारे में अपना समूचा पूर्वांचल अनजान था लेकिन आज ऐसा नहीं है .अब तक हमारे कुलपति प्रो सुन्दरलाल जी की प्रेरणा से  कुल तीन बापू-बाज़ार आयोजित किये जा चुके हैं जिसे समाज के लोंगों नें बहुत आशा और सम्मान के साथ आत्मसात किया है. बापू बाज़ार श्रृंखला के अंतर्गत रविवार को पब्लिक महिला सहर पीजी कालेज मुहम्मदाबाद मऊ में तीसरा बापू बाज़ार लगा.इस बाज़ार में बड़ी संख्या में गरीबों ने कपड़ों की खरीददारी की. गरीबों के लिए लगने वाला यह अनोखा बाज़ार हैं. इस बाज़ार की शुरुआत  जौनपुर से हुई थी. इसमें बिकने वाले सामानों को राष्ट्रीय सेवा योजना के कैडेटों द्वारा  समाज के लोगों से मांग कर जुटाया जाता हैं.गरीबों का आत्म सम्मान भी बना रहे और कपडे भी मिल जाये इसलिए  इनका प्रतीकात्मक मूल्य रख कर बापू बाज़ार में बेचा जाता हैं.इससे गरीबों की सम्मान सहित सहायता होती हैं.  
मऊ जनपद में आयोजित इस   बापू बाज़ार का शुभारम्भ  भी कुलपति प्रो सुन्दर लाल जी ने  ही किया.   इस अवसर पर आपनें   कहा कि बापू बाज़ार के लिए जिन विद्यार्थियों  ने सामानों को घर -घर जा कर  जुटाया हैं वह समाज और राष्ट्र के लिए  बहुत नेक काम कर रहे हैं  . बापू का सपना था कि  समाज का हर वर्ग कंधे से कन्धा मिला चले. जो गरीब हैं उनके उत्थान  के लिए भी हमें आगे आना चाहिए.बापू बाज़ार , एक बाज़ार नहीं हैं यह  एक विचार हैं जिसके कारण हमारे मन में समाज के निर्बल लोगों के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव आता हैं. हमें जीवन में वस्तुओं का मूल्य समझना चाहिए . बहुत सारी वस्तुएं जो हमारे लिए उपयोगी नहीं होती हैं. वह दूसरे  के लिए बहुमूल्य हो सकती हैं .इसलिए ये हमारी नैतिक रूप से जिम्मेदारी होती हैं कि हम इन वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुचाएं. बापू बाज़ार के माध्यम से हम इसी काम को कर रहे हैं.छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विद्यार्थी जीवन ही वह स्वर्णिम काल है जब अपनी पूरी ऊर्जा, त्याग-तपस्या के साथ देशसेवा में लगाई जा सकती है। इसके लिए कर्मपथ पर निरंतर अग्रसर रहना प्रथम आवश्यक शर्त है। हमें जीवन में वस्तुओं का मूल्य समझना चाहिए . बहुत सारी वस्तुएं जो हमारे लिए उपयोगी नहीं होती हैं. वो दूसरे के लिए बहुमूल्य हो सकती हैं .इसलिए ये हमारी नैतिक रूप से जिम्मेदारी होती हैं कि हम इन वस्तुओं  को जरूरतमंदों तक पहुचाएं. बापू बाज़ार के माध्यम से हम इसी काम को कर रहे हैं.    वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक डॉ हितेंद्र प्रताप सिंह की  सक्रिय पहल  और 33 राष्ट्रीय सेवा योजना की इकाइयों के सहयोग से आयोजित इस बाज़ार में बिकने वाले कपड़ो की कीमत  २ से १० रुपये रही. खास बात ये थी कि सिर्फ वो लोग इसमें खरीददार थे जो पहले से राष्ट्रीय सेवा योजना के कैडेटों द्वारा  चिन्हित किये गए थे.बाज़ार में जुटे हजारों लोगों नें  खूब खरीदारी की. इसमें साड़ी,पैंट,सलवार ,कमीज, आदि हर उम्र के लोगों के लिए कपडे , बर्तन आदि  थे.बाज़ार में मुफ्त में किताबें और खिलौनों को भी  दिया गया.बापू का चरखा भी इस बाज़ार में देखने को मिला . 





3 comments:

  1. यह एक प्रशंसनीय प्रयास है.आज जब लोग केवल अपने तक सीमित हो रहे हों ऐसे में वसुधैव कुटुम्बक की अपनी पुरानी अलख को भी यह अभियान बल प्रदान करेगा.
    इस अभिनव सोच और समाज में एक नये नवाचार को स्थापित करने के लिए आदरणीय कुलपति जी को बहुत -बहुत धन्यवाद.

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  2. एक अभिनव सोच और उससे बढ़कर विचार को जमीनी हकीकत प्रदान कर देना काबिले तारीफ़ है !

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